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परिचय10, कर्म सिद्धांत- कर्म बड़ा या भाग्य

कर्म सिद्धांत 

प्रभु प्रेमियों ! पिछले अध्यायों में हम लोग जान चुके हैं कि कर्म क्या है और कर्म कितने प्रकार के होते हैं। इस अध्याय में हम लोग जानेंगे।
कर्म के अंतर्गत हमलोगों कैसे फंसे हुए हैं? कर्म बड़ा है या भाग्य? इसे समझाने के लिए निम्नलिखित बातें सद्गुरु महर्षि मेंही परमहंस जी महाराज के प्रवचन से ली गई है। 

कर्म सिद्धांत-  कर्म बड़ा या भाग्य। कर्म संबंधी बातों पर चर्चा करते गुरुदेव
कर्म संबंधी बातों पर चर्चा करते गुरुदेव


कर्म के प्रकार

कर्म तीन प्रकार के होते हैं-- क्रियमान, संचित और प्रारब्ध । जो कर्म हम वर्तमान में करते हैं,  वे क्रियमान कहलाते हैं। क्रियमान कर्म ही एकत्रित होने पर संचित कहलाते हैं। उसी संचित में से जिसका भोग करने लगते हैं, वह प्रारब्ध कहलाता है।
ध्यानशील का क्रियमाण कर्म पवित्र होता है। क्रियमाण कर्म को फलशा छोड़कर करता है ।
"करना सही न लेना कुछ भी, बांना  झाखर झूरों का ।"   (श्रीकास्ट जिह्वा स्वामी)
मस्त आदमी का यह काम है कि पाप नहीं करे। भला कर्म करे, तो उसका फल नहीं चाहे। प्रारब्ध कर्म तब तक भोगेगा, जब तक शरीर रहेगा।


SD10,  कर्म सिद्धांत-  कर्म बड़ा या भाग्य। कर्म व्याख्याता गुरुदेव
Karma व्याख्याता गुरुदेव



      ध्यान में सिमटाव होता है। सिमटाव में उर्ध्वगति होती है। उसकी इतनी उर्ध्वगति होती है कि कर्म-मंडल को पाकर जाता है। जिसके लिए गोरखनाथ जी ने लिखा-- " जाता जोगी किनहुं न  पावा।"
     जब तक शरीर में रहता है। प्रारब्ध भोगना पड़ता है, किंतु उसी तरह भोगता है, जैसे नशे में  मस्त रहता है । ध्यान योगी परमात्मा के पास जाता है । परमात्मा को पहचानता है । जैसे सूर्य के ताप से झाड़ा भाग जता है;  उसी तरह परमात्मा की पहचान में पाप-ताप सभी भाग जाते हैं। इसलिए सभी कोई ध्यान करो।

कर्म बड़ा या भाग्य

"निधड़क बैठा नाम बिनु,चेति न करे पुकार।
  यह तन जल का बुधवार, बिनसत नाही बार ।।
  आज कहै मैं काल्ह भजूंगा, काल्ह कहै फिर काल।    आज काल्ह के करत ही, औसर जासी चाल।।"

     ऐसा मत करो । डर के मारे खेती करते हैं ।खेती नहीं करेंगे, तो अनाज नहीं होगा । भूखो रहना पड़ेगा, वस्त्र नहीं मिलेगा--  इस डर से खेती का काम करते हैं । समय पर खेत जोतते हैं, कोड़ते हैं, बोते हैं, फसल काटे हैं। उसी तरह डरो कि यह शरीर कब छूट जाएगा, ठिकाना नहीं। इसलिए डरो और ईश्वर का भजन करो। मांस- मछली नहीं खाओ। नशा नहीं खाओ।

SD10,  कर्म सिद्धांत-  कर्म बड़ा या भाग्य। ऋषियों द्वारा कर्म पर चर्चा।
ऋषियों द्वारा कर्म पर चर्चा

      धन्नियो के घर के नौकरानी की तरह संसार में रहना सीखो। नौकरानी मुंह से तो हमेशा यही कहा करती है कि लड़के बच्चे घर-वार सब मेरे ही हैं। पर उसका मन जानता है कि मेरा वहां कुछ भी नहीं है । सब मेरे मालिक के हैं। इसी तरह बाहर में सब काम अपना जानकर करते रहो । किन्तु मन से हमेशा जान रखो-- तुम्हारा यहां कुछ भी नहीं है, सभी मालिक के हैं। उसका हुकुम होते ही सब छोड़कर चला जाना पड़ेगा। इसके सिवा काम में त्रुटि होने पर मालिक की धमकी का भी डर रहता है। संसार में आना सख्त रहो और ईश्वर का भजन करो ।

SD10,  कर्म सिद्धांत-  कर्म बड़ा या भाग्य। कर्म मकान पर चर्चा करते हुए गुरुदेव।
कर्म, अकर्म पर चर्चा करते हुए गुरुदेव

     यह सुनकर मन बहुत प्रसन्न हुआ कि यहां के लोग बीड़ी-सिगरेट आदि नही पीते। जो बनिया बीड़ी-सिगरेट बेचे, उसे ₹5 जुर्माना होंगे और जो उसे खरीदे उसे ₹2 जुर्माना। सुनकर की मांस-मछली नहीं खाने वालों की संख्या विशेष है । बहुत खुशी हुई। जो कुछ अन्य आदमी मांस मछली खाते हैं ,उन्हें भी छोड़ देना चाहिए ।
     मत्स्य-मांस,नशा आदि खाना पीना छोड़ दो। सात्त्विक भोजन करो । भजन करो ‌। पाप कर्मों से बचो। शांति-सुख से रहने का ये यत्न है।



प्रभु प्रेमियों !   हम आशा करते हैं । कर्म से संबंधित बहुत बातों की जानकारी आपको हो गई होगी । इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार का शंका या कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस लेख के बारे में अपने इष्ट-मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी इससे लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने। इससे आपको आने वाले  पोस्ट की सूचना नि:शुल्क मिलती रहेगी।

     अगला अध्याय में  कुछ और बातों के बारे में जानेंगे? उस पोस्ट को पढ़ने के लिए    यहां दबाएं।       
परिचय10, कर्म सिद्धांत- कर्म बड़ा या भाग्य परिचय10,  कर्म सिद्धांत-  कर्म बड़ा या भाग्य Reviewed by सत्संग ध्यान on 11/15/2017 Rating: 5

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