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SD08, कर्म का सिद्धांत एक परिचय --सद्गुरु महर्षि मेंहीं

 कर्म का सिद्धांत क्या है?

प्रभु प्रेमियों ! पिछले 7 अध्यायों में हम लोग जान चुके हैं कि सत्संग ध्यान से ज्ञान होता है- ईश्वर को प्राप्त करके सभी दुखों से मुक्त हो जाना है। यहां जानेंगे कि हमलोग ईश्वर को प्राप्त क्यों करें? इसके लिए कर्म सिद्धांत को समझना बहुत जरूरी है। तो आइए कर्म सिद्धांत को समझने के लिए निम्नांकित बिंदुओं को समझना जरूरी होगा। इसे स्टेप बाय स्टेप समझेंगे।
कर्म क्या होता है? कर्म का सिद्धांत क्या है?  किस कर्म का क्या परिणाम है? कर्म कितने प्रकार के होते हैं? संचित कर्म, प्रारब्ध कर्म, क्रियमाण कर्म किसे कहते हैं? कोई भी कर्म कैसे कट सकता है? उसका क्या उपाय है? शास्त्रों में पाप से बचने का क्या उपाय बताया गया है? कर्म बड़ा है या भाग्य? आइए सबसे पहले जानते हैं कि कर्म क्या होता है?


SD08, कर्म का सिद्धांत एक परिचय  --सद्गुरु महर्षि मेंहीं। कर्म सिद्धांत और संत
कर्म सिद्धांत और संत


गुरु सेवा रूप कर्म

उपर्युक्त चित्र में सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज व्हील चेयर पर बैठे हुए हैं और उनके शिष्य उनकी सेवा में तत्पर हैं। कोई ह्वीलचेयर पकड़े हुए हैं। कोई उनके पैर में चप्पल एवं जुराब लगा रहे हैं । कोई गुरु महाराज को पकड़कर खड़ा कर किए हुए हैं।  यह सभी एक प्रकार का कर्म है।


कर्म क्या है? What is karma

साधारण बोलचाल की भाषा में कर्म का अर्थ होता है 'क्रिया'। व्याकरण में क्रिया से निष्पाद्यमान फल के आश्रय को कर्म कहते हैं। "राम घर जाता है' इस उदाहरण में "घर" गमन क्रिया के फल का आश्रय होने के नाते "जाना क्रिया' का कर्म है।
दर्शन में कर्म एक विशेष अर्थ में प्रयुक्त होता है। जो कुछ मनुष्य करता है उससे कोई फल उत्पन्न होता है। यह फल शुभ, अशुभ अथवा दोनों से भिन्न होता है। फल का यह रूप क्रिया के द्वारा स्थिर होता है। दान शुभ कर्म है पर हिंसा अशुभ कर्म है। यहाँ कर्म शब्द क्रिया और फल दोनों के लिए प्रयुक्त हुआ है। यह बात इस भावना पर आधारित है कि क्रिया सर्वदा फल के साथ संलग्न होती है। क्रिया से फल अवश्य उत्पन्न होता है। 

SD08, कर्म का सिद्धांत एक परिचय  --सद्गुरु महर्षि मेंहीं। कर्म सिद्धांत व्याख्याता सद्गुरु महर्षि मेंही
कर्म सिद्धांत व्याख्याता सद्गुरु महर्षि मेंहीं


कर्म का सिद्धांत क्या है? 

"सब लोग अपनी मंगल कामना करते हैं । सब लोग बराबर कर्म करते हैं। कर्म दो ही तरह के होते हैं-(१) शुभ और (२) अशुभ इन दोनों कामों को करने के लिए लोग लगे रहते हैं। जो अंशुभ कर्म विशेष करते हैं, वह पापी और जो शुभ कर्म विशेष करते हैं, उन्हें पुण्यात्मा कहते हैं; किंतु ऐसा नहीं है कि पुण्यात्मा से पाप नहीं होता। उनसे भी पाप कर्म हो जाता है; जैसे महाराज युधिष्ठिर। लोग पाप का फल दुख भोगना नहीं चाहते। पुण्य का फल है सुख भोगना चाहते हैं। पाप और पुंय दोनों का फल दुख और सुख है ; किंतु पाप और पुंय दोनों कर्म बंधनवाले हैं। एक लोहे का बंधन है, तो दूसरा सोने का। पाप कर्म करके लोग दान पुण्य तीर्थ आदि करके चाहते हैं कि पाप नाश हो जाएगा; किंतु ऐसा नहीं होता ।"--सद्गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज ।  दिनांक- 25/4/ 1954 ईस्वी तोफिर दियारा, मुंगेर; बिहार (भारत) ।

SD08, कर्म का सिद्धांत एक परिचय  --सद्गुरु महर्षि मेंहीं। पांडवों का स्वर्गारोहण
पांडवों का स्वर्गारोहण

कर्म का सिद्धांत 

प्रभु प्रेमियों ! कोई भी काम करके हम उसके परिणाम से नहीं बच सकते। ऐसा ईश्वरीय सिद्धांत है । इसको समझने के लिए हम लोग महाभारत में वर्णित इस कथा पर विचार करें।
महाभारत के मैदान में द्रोन के तीर से सब व्याकुल हो गए थे। उन्हें कोई रोक नहीं सकता था । भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि झूठा हल्ला कर दो कि अस्थामा मारा गया। क्योंकि द्रोण को था कि वह अपने पुत्र की मृत्यु का नाम सुनने से मर जाएगा। अर्जुन ने भगवान के बात को सुना ही नहीं । भीम ने अवंती देश के राजा के हाथी को जिसका नाम 'अश्वत्थामा' था मारकर हल्ला कर दिया कि अस्थमा मारा गया। द्रोन को विश्वास नहीं हुआ; उन्होंने कहा कि यदि राजा युधिष्ठिर कहे, तब विश्वास करूंगा । सब लोग और भगवान की प्रेरणा से उनको झूठ बोलना पड़ा कि अस्थमा मरा, मनुष्य या हाथी...। हाथी कहने के समय धीमे स्वर में कहा और मनुष्य कहने के समय में जोर से कहा। उसी समय लोगों ने बाजे बजा दिए, द्रोण कमजोर हो गया और मारा गया। इस झूठ के पाप का फल युधिष्ठिर को भोगना पड़ा और नरक भोगना पड़ा ।

SD08, कर्म का सिद्धांत एक परिचय  --सद्गुरु महर्षि मेंहीं। महाभारत की लड़ाई
महाभारत की लड़ाई।

किस कर्म का क्या परिणाम है?

     भगवान कृष्ण के संसार में नहीं रहने की खबर जब पांचों पांडवों और द्रौपदी को मिली, तो राज छोड़ कर चल दिए । व्रती होकर दान देते हुए, तीर्थों में भ्रमण करने लगे। पहाड़ों में पहले घटोत्कच ले जाता था, किंतु वह तो युद्ध में मारा गया था। ये लोग पैदल ही चलते थे। चलते-चलते द्रौपदी गिर गयी। चारो भाइयों के गिरने की बात और भीम का पूछना कि यह सब क्यों गिरे,? द्रोपदी को चाहिए था कि सब भाइयों को बराबर देखना;  किंतु वह अर्जुन का पक्ष करती थी। सहदेव को पंडिताई का घमंड था। नकुल को अपनी सुंदरता का घमंड था ।अर्जुन को अपने बल-पौरुष का घमंड था । जितना मनसुबा बांधता था, उतना कर न सका। जितना काम कर ना सको; उतना बोलो नहीं। इसी पाप से गिरा । भीम ने अपने लिए पूछा तो कहा कि तुम अपने बल के आगे किसी को कुछ नहीं समझते थे। युधिष्ठिर सदेह स्वर्ग गए। किंतु देवदूतों ने उन्हें अंधकार के मार्ग से, खराब रास्ते होकर ले चलें; जहां बहुत दुर्गंध थी। लौटने लगे, तब देवमाया से अर्जुन, नकुल, भीम, द्रौपदी आदि के मुंह का शब्द सुना । दो मुहूर्त के बाद फिर साफ हो गया।



SD08, कर्म का सिद्धांत एक परिचय  --सद्गुरु महर्षि मेंहीं । नरक का दृश्य
नरक का दृश्य


इससे शिक्षा मिलती है कि पाप का फल भोगना ही पड़ेगा। स्वर्ग में जाकर फल भोगो। फल समाप्त हो जाए, तो फिर उसी के अनुकूल गरीब-अमीर के घर जन्म लो, दुख-सुख सहो। मनुष्य पहले
मन से कर्म करता है , फिर मन और देह- दोनों से करता है। पहले सुक्ष्म मन से करता है। फिर सूक्ष्म मन और स्थूल देेेह से करता है। इसलिए स्थूल जगत में आकर स्थूल देह  और सुक्ष्म मन के साथ है सुख दुख भोगता है।



SD08, कर्म का सिद्धांत एक परिचय  --सद्गुरु महर्षि मेंहीं। अर्जुन और कृष्ण संवाद
अर्जुन और कृष्ण संवाद

 कर्म के प्रकार

    बिना अंकुर के वृक्ष नहीं होता। संसार में बहुत तरह के बर्तन बनते हैं । इसका मसाला मिट्टी है। इस शरीर के बनने के मसाले का नाम प्रकृति है। यह त्रयगुणों का सम्मिश्रण रूप है। यह त्रय गुण है-  रजोगुण , तमोगुण और सतोगुण । रजोगुण उत्पादक, सतोगुण पालक और तमोगुण विनाशक है। यह तीनों बराबर-बराबर भाग से बने हैं । वह प्रकृति कैसी है? इसके लिए बुद्धि ही निर्णय करती है। किंतु पहचान नहीं सकती। वर्णन नहीं कर सकती; क्योंकि वह इंद्रिय ज्ञान से परे है।।  * शेष दूसरे पेज में पढ़ने के लिए यहां दबाएं।



प्रभु प्रेमियों !   हम आशा करते हैं । कर्म से संबंधित कुछ बातों की जानकारी आपको हो गई होगी । इतनी जानकारी के बाद भी अगर आपके मन में किसी प्रकार का शंका या कोई प्रश्न है, तो हमें कमेंट करें। इस लेख के बारे में अपने इष्ट-मित्रों को भी बता दें, जिससे वे भी इससे लाभ उठा सकें। सत्संग ध्यान ब्लॉग का सदस्य बने। इससे आपको आने वाले  पोस्ट की सूचना नि:शुल्क मिलती रहेगी। तब तक के लिए जय गुरु महाराज  !  !

SD08, कर्म का सिद्धांत एक परिचय --सद्गुरु महर्षि मेंहीं SD08, कर्म का सिद्धांत एक परिचय  --सद्गुरु महर्षि मेंहीं Reviewed by सत्संग ध्यान on 11/12/2017 Rating: 5

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